जसपुर: बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं में उपयोगिता तलाशकर उन्हें आकर्षक उत्पादों में बदलने का हुनर अब राजकीय डिग्री कॉलेज जसपुर की छात्रा गुनगुन प्रजापति को उद्यमिता की राह पर ले जा रहा है। बीए की छात्रा गुनगुन ने अपने रचनात्मक कौशल को कारोबार का रूप देने के लिए ‘आमाधिया ईको स्टूडियो’ नाम से उद्यम शुरू करने की पहल की है।

Gungun from Jaspur to set up a business by transforming waste into art.

सुभाष कॉलोनी निवासी गुनगुन को यह अवसर उच्च शिक्षा विभाग, उत्तराखंड की देवभूमि उद्यमिता योजना के तहत मिला। उनका चयन तीन दिवसीय आवासीय उद्यमिता प्रशिक्षण शिविर के लिए किया गया था। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें उत्पाद निर्माण के साथ-साथ लागत निर्धारण, मूल्य तय करने, गुणवत्ता, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग जैसे कारोबारी पहलुओं की जानकारी दी गई।

‘कचरे से शिल्प’ बनेगा ब्रांड की पहचान

प्रशिक्षण के दौरान गुनगुन के विचार को स्पष्ट दिशा मिली और उनके प्रस्तावित उद्यम का नाम ‘आमाधिया ईको स्टूडियो’ तय किया गया। यह ब्रांड ‘कचरे से शिल्प’ की अवधारणा पर काम करेगा। इसके तहत अनुपयोगी और बेकार सामग्री को रचनात्मक तरीके से हस्तनिर्मित, आकर्षक और उपयोगी उत्पादों में बदला जाएगा।

गुनगुन का उद्देश्य केवल उत्पाद तैयार करना ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देना भी है।

मजदूर पिता की बेटी ने चुनी उद्यमिता की राह

गुनगुन के पिता मजदूरी करते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद गुनगुन ने अपने हुनर और रचनात्मक सोच को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। अब वह ‘आमाधिया ईको स्टूडियो’ के माध्यम से ‘कचरे से संपदा’ और ‘कचरे से शिल्प’ की अवधारणा को धरातल पर उतारने की तैयारी कर रही हैं।

देवभूमि उद्यमिता योजना के प्रोग्राम मैनेजर डॉ. रजत शर्मा, कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पुष्कर सिंह बिष्ट, सविता राठौर, डॉ. रितिका विश्नोई सहित अन्य शिक्षकों ने छात्रा को इस पहल के लिए बधाई दी और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

ब्रांड को नई पहचान देने का लक्ष्य

सुशील गौड़, नोडल अधिकारी, देवभूमि उद्यमिता योजना, राजकीय महाविद्यालय जसपुर ने बताया कि योजना के सहयोग से छात्रा के उद्यम का पंजीकरण कराया गया है। अब लक्ष्य ‘आमाधिया ईको स्टूडियो’ को ऐसे ब्रांड के रूप में विकसित करना है, जो लोगों को कचरे को फेंकने के बजाय उसमें छिपी उपयोगिता पहचानने के लिए प्रेरित करे।

गुनगुन की यह पहल न केवल स्वरोजगार की दिशा में एक कदम है, बल्कि कचरे के पुन: उपयोग और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाली पहल भी है।

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