देहरादून। उत्तराखंड में NEET-UG के जरिए MBBS प्रवेश के लिए कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल से जुड़े मामले में जांच लगातार नए खुलासे कर रही है। देहरादून पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने मामले में कथित मास्टरमाइंड रूपेश पंडित और उसके सहयोगी अरविंद कुमार को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि यह केवल फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला नहीं, बल्कि मेडिकल प्रवेश दिलाने के नाम पर चल रहे एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।

पुलिस के अनुसार रूपेश पंडित स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के तहत MBBS में प्रवेश दिलाने के लिए प्रति छात्र लगभग 45 लाख रुपये तक की डील करता था। जांच में यह भी सामने आया है कि तीन अभ्यर्थियों के परिजनों से 20-20 लाख रुपये अग्रिम राशि के रूप में लिए गए थे। शेष भुगतान प्रवेश सुनिश्चित होने के बाद किया जाना था। SIT अब इन वित्तीय लेनदेन की पूरी श्रृंखला खंगाल रही है।
जांच के दौरान एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि कई अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर से संबंध दर्शाया गया था। पुलिस इस बात की पड़ताल कर रही है कि इन प्रमाणपत्रों को तैयार करने और प्रमाणित कराने में किन लोगों की भूमिका रही। साथ ही कुछ दस्तावेजों में प्रयुक्त तस्वीरों के AI तकनीक की मदद से तैयार किए जाने की आशंका भी जांच के दायरे में है।
प्रारंभिक जांच के आधार पर SIT को संदेह है कि इस कथित नेटवर्क में अलग-अलग स्तरों पर लोगों की जिम्मेदारियां तय थीं। कुछ लोग ऐसे अभ्यर्थियों की तलाश करते थे जिन्हें NEET में अपेक्षित रैंक नहीं मिली थी या पसंदीदा मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पा रहा था। इसके बाद कथित तौर पर विशेष श्रेणियों के फर्जी दस्तावेज तैयार कर प्रवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता था।
पुलिस के अनुसार बिहार निवासी रूपेश पंडित पिछले कई वर्षों से मेरठ में एक एजुकेशन कंसल्टेंसी संचालित कर रहा था। जांच में सामने आया है कि उसकी संस्था मेडिकल और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने का काम करती थी। अब यह जांच की जा रही है कि इस नेटवर्क की गतिविधियां उत्तराखंड के अलावा अन्य राज्यों तक भी फैली हुई थीं या नहीं।
गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों के मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों को जांच के लिए कब्जे में लिया गया है। SIT कॉल रिकॉर्ड, चैट, ईमेल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों के माध्यम से नेटवर्क से जुड़े लोगों की पहचान करने में जुटी है। साथ ही बैंक खातों और वित्तीय लेनदेन की भी विस्तृत जांच की जा रही है।
देहरादून पुलिस के मुताबिक फिलहाल करीब 12 लोगों की भूमिका संदेह के दायरे में है। इनमें दस्तावेज तैयार कराने, सत्यापन प्रक्रिया में शामिल रहने, प्रवेश दिलाने में मदद करने या फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल से जुड़े लोगों की जांच की जा रही है।
मामले की जांच अब केवल छात्रों और कथित बिचौलियों तक सीमित नहीं है। फर्जी प्रमाणपत्रों के सत्यापन और जारी होने की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया भी जांच के घेरे में आ गई है। इसी क्रम में देहरादून तहसील सदर के दो लेखपालों को निलंबित किया जा चुका है। प्रशासनिक जांच में प्रमाणपत्रों के सत्यापन में लापरवाही की बात सामने आई है।
फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर MBBS प्रवेश के मामले के उजागर होने के बाद राज्य सरकार ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है। स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के अलावा अन्य आरक्षित श्रेणियों के प्रमाणपत्रों की भी जांच कराई जा रही है। कई प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए हैं और कुछ प्रवेश पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं।
SIT अब पूरे नेटवर्क की परत-दर-परत जांच कर रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच में जो भी व्यक्ति फर्जी दस्तावेज तैयार कराने, उनका उपयोग करने या प्रवेश प्रक्रिया में अनियमितता करने में शामिल पाया जाएगा, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। मामले में आगे और गिरफ्तारियां होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया है।
