उत्तरकाशी: उत्तरकाशी के प्रसिद्ध दयारा बुग्याल में सोमवार को पारंपरिक अढूंड़ी उत्सव (Butter Festival 2026) की धूम है। समुद्र तल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर मनाया जाने वाला यह अनोखा पर्व अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए देशभर में पहचान रखता है। यहां रंगों से नहीं, बल्कि दूध, दही, मक्खन और मट्ठे से होली खेली जाती है।

मखमली घास और रंग-बिरंगे फूलों से सजे बुग्याल में स्थानीय ग्रामीणों के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे पर्यटक भी उत्सव में शामिल हो रहे हैं। अढूंड़ी उत्सव मनोरंजन के साथ-साथ प्रकृति, पशुधन और पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा से जुड़ा है।
दूध-मक्खन से खेली जाती है अनोखी होली
अढूंड़ी उत्सव की सबसे खास पहचान यहां होने वाली अनोखी होली है। उत्सव के दौरान रंगों के बजाय दूध, दही, मक्खन और मट्ठे का इस्तेमाल किया जाता है। ग्रामीण और पर्यटक एक-दूसरे पर दूध-मक्खन डालकर इस अनूठी परंपरा का हिस्सा बनते हैं।
मान्यता है कि यह परंपरा प्रकृति और पशुधन के प्रति ग्रामीणों की कृतज्ञता से जुड़ी है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा अब उत्तरकाशी के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी अलग पहचान बना चुकी है।
रैथल गांव से जुड़ी है अढूंड़ी पर्व की परंपरा
दयारा बुग्याल भटवाड़ी ब्लॉक के रैथल गांव से करीब सात किलोमीटर दूर स्थित है। हर साल रैथल के ग्रामीण भाद्रपद महीने की संक्रांति के अवसर पर अढूंड़ी उत्सव मनाते हैं।
इस बार भी उत्सव में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के साथ विभिन्न राज्यों से पर्यटक रैथल पहुंचे हैं। उत्सव से पहले गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान ने समेश्वर देवता की डोली के साथ ग्रामीणों के जत्थे को दयारा बुग्याल के लिए रवाना किया।
मवेशियों के साथ बुग्याल में बिताते हैं गर्मियां
दयारा बुग्याल स्थानीय ग्रामीणों की पारंपरिक पशुपालन संस्कृति का अहम हिस्सा है। गर्मियों में ग्रामीण अपने मवेशियों के साथ बुग्याल में डेरा डालते हैं। यहां पर्याप्त चारा मिलने से मवेशियों के दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है।
मानसून के बाद मौसम ठंडा होने पर ग्रामीण धीरे-धीरे मवेशियों के साथ वापस गांव लौटने लगते हैं। अढूंड़ी उत्सव को इसी पारंपरिक जीवनशैली और बुग्याल संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है।
हाईकोर्ट की गाइडलाइन के तहत आयोजन
उत्सव के दौरान हाईकोर्ट की गाइडलाइन का भी पालन किया जा रहा है। बुग्याल से करीब 800 मीटर दूर चिड़ापड़ा और गोई में आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाएं की गई हैं।
कार्यक्रम में पारंपरिक रीति-रिवाज और वेशभूषा के साथ पूजा-अर्चना होगी। इसके बाद दूध, दही और मक्खन से पारंपरिक होली खेली जाएगी।
रैथल में सजेगी सांस्कृतिक संध्या
अढूंड़ी उत्सव के बाद रैथल गांव में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा। इसमें स्थानीय लोक संस्कृति, लोक कला और पारंपरिक रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिलेगी।
हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों की मौजूदगी के चलते अढूंड़ी उत्सव अब उत्तरकाशी के प्रमुख सांस्कृतिक और पर्यटन आयोजनों में शामिल हो गया है।
